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लाखों की संख्या में वृक्षों की कटाई, कई एकड़ में बस्तियों की भरमार : राजनीति की रणनीति में कभी भी हो सकती है प्रकृति की भयंकर कहर..

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जल-जंगल और ज़मीन- वृक्षों की अवैध कटाई से लगातार प्रकृति को भयंकर क्षति में डाला जा रहा है यह क्षति इंसानों को ही दर्दनाक स्थिति तक ला चुकी है आगे का तो आप समझ ही सकते हैं परंतु ऐसा न हो कि हमारे समझने में ही देर हो जाए….राजनीतिक गलियारों में तो जल-जंगल-जमीन भाषण तक सीमित रह गई परंतु सशक्त जनता अशक्त न रह जाए…..

 

गरियाबंद। प्रदेश के गरियाबंद में धड़ल्ले से पेड़ों की।  कटाई जारी है। वृक्षों को काटकर बस्तियां बसाई जा रही है। ग्रामीण वन अधिकार पट्टे के लालच में बड़े स्तर से  जंगल साफ कर रहे हैं। उदंती अभ्यारण और सामान्य वन मंडल क्षेत्र के जंगल में लाखों पेड़ काट दिए गए हैं। बफर जोन में अवैध बस्तियों की भरमार है। रिकॉर्ड के मुताबित 16.59 वर्ग KM पर अवैध कब्जा हो चुका है। लाखों पेड़ काटकर अधिकार मांगने वाले 5 हजार 561 अपात्र की श्रेणी में हैं। पंचायत स्तर पर मिलीभगत से अवैध कब्जाधारी आवेदन करने में सफल हो जाते हैं। उदंती सीतानदी अभ्यारण्य के बफर जोन में करीब 30 हजार पेड़ काट कर 188 हेक्टेयर में बसाए गए सोरना माल बस्ती के खाली होने के बाद मामला प्रकाश में आया। अभ्यारण्य प्रशासन के पास दर्ज रिकॉर्ड के मुताबिक 1842.54 वर्ग किमी फैले उदंती सीतानदी अभ्यारण्य में 16.59 वर्ग किलोमिटर अर्थात 1659 हेक्टेयर पर 393 लोगों द्वारा कब्जा हो चुका है।

बड़ी मात्रा में हुई कटाई और जारी भी :

सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक 1842 वर्ग किमी में फैले अभ्यारण्य की सीमा में 393 लोगों ने डेढ़ लाख से भी ज्यादा संख्या में पेड़ काट 16.59 वर्ग किमी पर कब्जा किया। वास्तविक आंकड़े इससे भी ज्यादा हैं।

2008 के बाद यह कब्जा – दर्ज पीओआर के अनुसार कब्जाधारियों ने डेढ़ लाख से ज्यादा संख्या में वृक्षों की कटाई की है। रिपोर्ट के मुताबिक अभ्यारण्य के बफर जोन में 798.64 हेक्टेयर पर काबिज 314 के खिलाफ प्रकरण दर्ज है वहीं वन्य जीवों के लिए सर्वाधिक सुरक्षित और सवेदनशील माने जाने वाले कोर जोन में अतिक्रण का रकबा बफर की तुलना में ज्यादा है।

 

दूसरे राज्य से भी कब्जा, शासकीय योजनाएं भी हैं लागु :

यहां ओडिशा के नवरंगपुर जिले के रायघर ब्लॉक के सीमा लगने के कारण, ओडिशा के लोग अपने नाते रिश्तेदारों को बनाया, अब परिवार की संख्या 60 से ज्यादा है। 250 हेक्टेयर से भी ज्यादा रकबे में लोग मक्के की खेती करते हैं। वहीं इंदागांव रेंज में ही कक्ष क्रमाक 1216 में मेघापारा 1220 से 1229, 1240 चिपाड़, 1243, 1244 मेंगोरामाल नुआगांव के नाम से बस्ती बसा हुआ है। धुरुवागुड़ी बिट के क्रमांक 1237,1238 में बसे 35 घर जोड़कर करीब 2 हजार एकड़ से भी ज्यादा वन भूमि काबिज करने वाले 100 से भी ज्यादा लोगों के नाम कार्यवाही के सरकारी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं।

गांव के बने नियम के मुताबिक बसाहट के पहले ग्राम देवी के सामने पूजा करते हैं, फिर बकरा भात का दावत के आलावा कुछ जगहों पर एकड़ के हिसाब से 10 से 20 हजार तक अतरिक्त खर्च देना होता है. ग्राम के झाखर, पुजारी, पटेल और प्रमुख मान गए तो सरपंच को भी बुजुर्गो के सम्मान में सहमति देना होता है.

कब्जा जमाने का अवैधानिक तरीका :

अन्य क्षेत्रों के कब्जा धारी पंचायत के निवास प्रमाण पत्र के आधार पर अपना आधार पर पता सुधार लेते हैं फिर चुनाव की राजनीति में इसे पंचायत नया कस्बा और वार्ड घोषित कर देता है जिसके अनुसार आधार कार्ड और राशन कार्ड भी बन जाता है, फिर क्या,, अवैध भूमि पर क्रेड़ा का सोलर लाइट पंप, राशन, पेंशन से लेकर सब कुछ उपलब्ध हो जाता है।

वहीं उपनिदेशक सीतानदी अभ्यारण्य वरुण जैन के अनुसार 2005 के बाद का आवेदन निरस्त कर दिया जाता है और बेदखली के लिए अवैध कब्जाधारियों को नोटिस जारी किया गया है। इसरो द्वारा सेटेलाइट पिक्चर की मदद से वन अधिकार पट्टा के लिए आवेदनों की जांच की जाती है।


 

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Author: writers team

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