सूरजपुर। जरही, प्रकाश सिंह: शांतिकुंज हरिद्वार के तत्वाधान में सूरजपुर जिला के जरही नगर में 24 कुंडिय गायत्री महायज्ञ के प्रथम दिवस पर वृहद कलश यात्रा का आयोजन हर्षोल्लास के साथ किया गया जिसमें बड़ी संख्या में माताओं एवं बहनों का योगदान काफी सराहनीय रहा तत्पश्चात शांतिकुंज हरिद्वार से आए गुरुजनों के प्रवचन की तीव्रता से संपूर्ण क्षेत्र में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचालन देर रात्रि तक जारी रही। यह महायज्ञ गुरुवार से शनिवार तक समस्त प्रकार के संस्कारों से पूर्ण की जाएगी अतः समस्त सम्माननीय नागरिकों व पाठकों से निवेदन है की बड़ी संख्या में माता गायत्री के महायज्ञ में शामिल होकर पुण्यात्मक महसूस करें।
यह बहुत ही गर्व की विषय है कि हमारे सूरजपुर जिला के जरही नगर में 24 कुंडिय गायत्री महायज्ञ का आयोजन बड़े भाग्य से आयोजित हो रही है। हम सदैव इस विषय के समीप है की ईश्वर से हमारी दूरी समय के बदलाव के अनुसार बढ़ती जा रही है, हमें सार्वजनिक रूप से कुछ ही अवसर मिल पाते हैं जिस वजह से हमारी नजदीकियां ईश्वर से बनी रहे और यह अवसर खुद ही हमारे पास प्रकट हुआ है अतः यह अवसर का लाभ हम जरुर उठाएंगे और ईश्वर से अपनी समीपता को सदैव मजबूत बनाते रहेंगे।

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परम पूजनीय गुरुदेव पंडित श्री राम शर्मा आचार्य जी का एक संक्षिप्त जीवन परिचय :
भारतीय इतिहास में ऐसे अवतरण जो करोड़ों ही नहीं पूरी वसुधा के उद्धार चेतनात्मक धरातल पर सबके मनों का नए सिरे से निर्माण करती है। परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य को एक ऐसी ही सेवा के रूप में देखा जा सकता है जो युगों युगों में गुरु एवं अवतारी सेवा दोनों ही रूपों में हम सबके बीच प्रकट हुई। 80 वर्ष का जीवन जीकर एक विराट ज्योति प्रज्वलित कर उस सूक्ष्म ऋषि चेतना के साथ एकाकार हो गई जो आज युग परिवर्तन को सन्निकट लाने को प्रतिबद्ध है। परम वंदनीय माताजी शक्ति का रूप थी जो कभी महाकाली, कभी मां जानकी कभी मां शारदा एवं कभी मां भगवती के रूप में शिव की कल्याणकारी कार्यों का साथ देने आती रही है। सूक्ष्म में विलीन हो स्वयं को अपने आराध्य के साथ एकाकार कर ज्योतिपुरुष का एक अंग स्वयं को बना लिया। आज दोनों सशरीर हमारे बीच नहीं है किंतु नूतन सृष्टि कैसे डाली गई, कैसे मानव गढ़ने का सांचा बनाया गया, इसे शांतिकुंज ब्रह्मवर्चस्व गायत्री तपोभूमि अखंड ज्योति संस्थान एवं युग तीर्थ आंवलखेड़ा जैसी स्थापनाओं तथा संकल्पित सृजन सेनानीगाणों के, वीरभद्रों की करोड़ से अधिक की संख्या के रूप में देखा जा सकता है।
परम पूज्य गुरुदेव का वास्तविक मूल्यांकन तो कुछ वर्षों बाद इतिहासविद मिथक लिखने वाले करेंगे किंतु यदि उनको आज भी साक्षात कोई देखना या उनसे साक्षात्कार करना चाहता है तो उन्हें उनके द्वारा अपने हाथ से लिखे गए उसे विराट परिमाण में साहित्य के रूप में युग संजीवनी के रूप में देखा जा सकता है जो वे अपने वजन से अधिक भार के बराबर लिख गए। इस साहित्य में संवेदना का स्पर्श इस बारीकी से हुआ है की लगता है लेखनी को उसी की स्याही में डूबा कर लिखा गया हो, हर शब्द ऐसा जो हृदय को छूता, मन को, विचारों को बदलता चला जाता है। लाखों करोड़ों के मनों के अंत:स्थल को छूकर उसने उनका कायाकल्प कर दिया। रूसों के प्रजातंत्र की, कार्ल मार्क्स के साम्यवाद की क्रांति भी इसके समक्ष बौनी पड़ जाती है। उनके मात्र इस युग वाले स्वरूप को लिखने तक में लगता है कि एक विश्वकोष तैयार हो सकता है। फिर उस बहुआयामी रूप को जिसमें वे संगठनकर्ता, साधक, करोड़ों के अभिभावक, गायत्री महाविद्या के उद्धारक, संस्कार परंपरा का पुनर्जीवन करने वाले, ममत्व लूटाने वाले एक पिता, नारी जाति के प्रति अनन्य करुणा बिखेरकर उनके ही उद्धार के लिए धरातल पर चलने वाला नारी जागरण अभियान चलाते देखे जाते हैं, अपनी वाणी के उद्बोधन से एक विराट गायत्री परिवार एकाकी अपने बलबूते खड़े रहते दिखाई देते हैं तो समझ में नहीं आता क्या-क्या लिखा जाए, कैसे छंदबद्ध, लिपिबद्ध किया जाए, उस महापुरुष के जीवन चरित्र को।












