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पूर्व राज्यसभा सांसद गोपाल व्यास का निधन : सत्य पर अडिग, विशेष व्यक्तित्व के राष्ट्रसेवक रहे..

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रायपुर। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यसभा सदस्य गोपाल व्यास का आज सुबह निधन हो गया। उन्होंने 92 साल की उम्र में अपनी अंतिम सांस ली। वे छत्तीसगढ़ राजनीति में एक महत्वपूर्ण हस्ती थे। व्यासजी ने 3 अप्रैल 2006 से 2 अप्रैल 2012 तक छत्तीसगढ़ राज्य से राज्यसभा सांसद के रूप में सेवा दी। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता रहे और पार्टी व संघ के लिए जमीनी स्तर पर महत्वपूर्ण कार्य किए।

उनके पार्थिव देह का अंतिम दर्शन के लिए उनके निज निवास एचडीडी 33, विधायक कॉलोनी, रायपुर में सुबह 10:45 तक रखा गया है, इसके बाद देहदान के लिए एम्स रायपुर के गेट नंबर 5 के लिए ले जाया जाएगा।

आपातकाल के समय जेल में रहे बंद :

आपातकाल के दौरान व्यासजी ने भी संघर्ष किया था और 1975 से 1977 तक रायपुर की जेल में बंद रहे। उनका योगदान भारतीय राजनीति में अहम था और वे अपने संगठन के लिए हमेशा प्रतिबद्ध रहे। राज्यसभा से 13 फरवरी 2019 को सेवानिवृत्त होने के बाद वह सक्रिय राजनीति से दूर थे, लेकिन संगठन को मजबूत बनाने में उनका योगदान निरंतर था।

गोपाल व्यासजी का जन्म 15 फरवरी 1932 में रायपुर में हुआ था। उन्होंने जबलपुर से इंजीनियरिंग की डिग्री ली और भिलाईस्टील प्लांट में सीनियर इंजीनियर के रूप में सेवाएं दीं।

वे बाल्य काल में ही संघ के स्वयंसेवक बने, ततपश्चात गोपाल जी ने प्रांत कार्यवाहक, क्षेत्र प्रचारक आदि विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। जब वे भिलाई स्टील प्लांट में कार्यरत थे, तब प्रान्त कार्यवाह रहे। फिर नौकरी से वीआरएस लेकर उन्होंने सम्पूर्ण जीवन संघ की सेवा में समर्पित कर दिया। वे महाकौशल प्रान्त के प्रांत प्रचारक रहे। विश्व हिन्दू परिषद के अखिल भारतीय सयुंक्त महामंत्री रहे।

व्यास जी ने संघ कार्य विस्तार के लिए जबलपुर से रायपुर पैदल यात्रा भी की, गांव-गांव, घर-घर पहुंचे इसके लिए प्रयत्नशील रहे। वर्ष 1975 से 1977 तक आपातकाल के दौरान जेल में रहे। आपातकाल में जेल में रहते ही उन्होंने वकालत की पढ़ाई की। उनका पूरा जीवन त्यागमय था। वे अपने सिद्धांतों और सत्य पर अडिग रहने वाले व्यक्ति थे, उन्होंने कभी परिस्थितियों के साथ समझौता नहीं किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अपने जीवन में सर्वोच्च माना।

उनके पास केवल दो ही कार्य थे, एक नौकरी और दूसरा संघ कार्य। उनके साथ कार्य कर चुके लोग उन्हें सन्त के रूप में याद करते हैं। वे मिलनसार थे, जिससे भी मिलते थे तो बड़े प्रेम से मिलते थे। लोगों को कभी ये नही लगता था कि वे पहली बार उनसे मिल रहे हैं। एक बार सर संघचालक का आगमन दुर्ग में होने वाला था। केवल दो दिन में पत्रक बांटने थे। उस समय दुर्ग बहुत बड़ा जिला हुआ करता था। कवर्धा, बेमेतरा, छुईखदान, राजनांदगांव में पत्रक बांटते हुए दो दिन बाद दुर्ग पहुंचे। वे संघ के अथक सेवाधारी स्वयंसेवक थे। वे वर्ष 2006 से 2012 तक छत्तीसगढ़ से राज्यसभा के सदस्य भी रहे। उन्हें दूसरा कार्यकाल देने की बात उठी तो उन्होंने स्वयं यह कहकर मना कर दिया कि अन्य लोगों को अवसर मिलना चाहिए।

उनके सादगीपूर्ण जीवन के अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। एक बार राज्यसभा सांसद रहते हुए उन्हें भिलाई में संघ शिक्षा वर्ग में आमंत्रित किया गया। जब उन्हें बताया गया कि उन्हें लेने गाड़ी आ जायेगी तो उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वे स्वयं की व्यवस्था से आ जाएंगे। वे राज्य परिवहन की बस से भिलाई पहुंचे और वहाँ के स्वयंसेवकों को सूचना दी कि मुझे बस स्टैंड से ले लो। व्यवस्था में उपस्थित स्वयंसेवक उन्हें लेने पहुंचे तो उन्होंने कहा कि वे कार से नहीं जाएंगे। एक स्वयंसेवक जो कि दुपहिया वाहन से पहुंचे थे, भिलाई के तो सैकड़ों परिवार उन्हें अपने घर का मुखिया मानते हैं।

संसार से विदा होते हुए भी उन्हें समाज की ही चिंता थी, यही कारण है कि उनकी इच्छा के अनुसार उनका देहदान किया जाएगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी व्यास जी के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी है।



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