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छत्तीसगढ़ के इस जिले में मिला 28 करोड़ साल पुराना समुद्री जीवाश्म : प्रदेश सरकार का भी ध्यान केंद्रित..

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छत्तीसगढ़ का यह जिला देश ही नहीं संपूर्ण विश्व में एक पुरातत्व इतिहास का गवाह बन चुका है। वास्तव में यहां की प्राकृतिक संरचना बेहद खास है, एक बार आने के बाद आप मंत्र मुग्ध हो जाएंगे। वही 18वीं शताब्दी की ईस्ट इंडिया कंपनी का खनिज व्यापार और उनके द्वारा बनाई गई बड़ी-बड़ी पानी टंकियां इस बात की गवाह है कि क्षेत्र हमेशा से विशेष रही है।

मनेंंद्रगढ़। प्रकाश सिंह: वर्तमान सरकार ने पुरातत्व विज्ञान पर गहरी रुचि दिखाते हुए इसे नए सिरे से आगे बढ़ाने का कार्य प्रारंभ किया है। राज्य सरकार ने जीवाश्मों से संबंधित विस्तृत जानकारी एकत्रित करने और मनेंद्रगढ़ को एक प्रमुख वैज्ञानिक और पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने पर अणिग है।

प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि मनेंद्रगढ़ में 28 करोड़ साल पुराना समुद्री जीवाश्म मिलना छत्तीसगढ़ के लिए गर्व की बात है। यह न केवल वैज्ञानिक शोध का केंद्र बनेगा बल्कि पर्यटन से जुड़े रोजगार के नए अवसरों का सृजन भी होगा। राज्य सरकार अपनी प्राकृतिक धरोहरों को सहेजने और उनका विकास करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

मैरीन फॉसिल्स पार्क के रूप में विकसित होने के बाद यह क्षेत्र एक बायोडायवर्सिटी हेरिटेज साइट के रूप में पर्यटकों और वैज्ञानिकों के लिए खुलेगा। यहां आने वाले सैलानी करोड़ों साल पुराने जीवों की उत्पत्ति और उनके विकास की कहानी को देख और समझ सकेंगे। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया कोलकाता और बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट लखनऊ की टीमों ने इस क्षेत्र का अध्ययन कर इसकी संभावनाओं का जायजा लिया है।पुरातत्व विभाग के नोडल अधिकारी डॉ विनय कुमार पांडेय ने बताया कि यह एशिया का सबसे बड़ा जीवाश्म है। देश-विदेश से वैज्ञानिक यहां अध्ययन करने आएंगे। कार्बन डेटिंग से पता चला कि यह 28 करोड़ साल पुराना है। पुर्व में 1954 में इसकी खोज डॉ. एसके घोष ने की, फिर ईएसआई व लखनऊ बीरबल की टीम ने लगातार इस पर सर्वे किया। वैज्ञानिकों के अनुसार 28 करोड़ वर्ष पूर्व वर्तमान हसदेव नदी के स्थान पर एक ग्लेशियर था, जो बाद में श्टाॕथिसश् नामक पतली पट्टी (Plate) के रूप में समुद्र में समा गया जिससे होकर समुद्री जीव-जंतु मनेन्द्रगढ़ की वर्तमान हसदेव नदी में प्रवेश कर गए। वे धीरे-धीरे विलुप्त हो गए लेकिन उनके जीवाश्म आज भी उक्त स्थल पर देखे जा सकते हैं। वर्ष 2015 में बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोलिथिक साइंसेज लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इसकी पुष्टि की थी।

जीवाश्मों के अवशेषों से यह प्रमाण मिलता है कि करोड़ों साल पहले इस क्षेत्र में समुद्र था, जो बाद में प्राकृतिक परिवर्तन के कारण हटा और इन जीवों के अवशेष पत्थरों में दबकर जीवाश्म के रूप में संरक्षित हो गए। यह एक महत्वपूर्ण खोज है जो पृथ्वी के इतिहास और परिवर्तन के बारे में हमें जानकारी प्रदान कर सकती है, यह जीवाश्म क्षेत्र वास्तव में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और वैज्ञानिक धरोहर है, जो पृथ्वी के प्राचीन इतिहास को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) द्वारा 1982 से इस क्षेत्र को नेशनल जियोलॉजिकल मोनुमेंट्स के रूप में संरक्षित किया गया है, जो विषेश भौगोलिक संरचना प्रकट करता है।



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