एक गरीब जिसके घर एक वक्त खाने की रोटी उपलब्ध नहीं है उसके घर किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है और सरकारी विभाग में एक प्रमाण-पत्र जारी करने के लिए उससे 200-500 रूपये मांगे जाते हैं, उसकी व्यथा एक बार महसूस कर के देखें, यदि आप सचमुच भारत के एक नागरिक हैं तो आपको अपने मतदान का गंभीरता से सदुपयोग करना होगा।
प्रकाश सिंह, रायपुर। हमारे सुनहरे भारत को बेहतरीन तरीके से गढ़ने का आपके एक मतदान से अच्छा अवसर और नहीं हो सकता, इस लोकतांत्रिक देश में लोक हम ही हैं और हमसे ही तंत्र बना हुआ है जिसे लोकतंत्र कहते हैं मतदान के बाद अक्सर हम यही कहा करते हैं की सड़क खराब है नेताओं के महल हैं गरीबों का झोपड़ी है, मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए भी पैसे दिए है मैंने सरकारी सिस्टम में तो बिना पैसों के काम ही नहीं हो रहा है अब बताइए एक गरीब जिसके घर एक वक्त खाने की रोटी उपलब्ध नहीं है उसके घर किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है और सरकारी विभाग में एक प्रणाम-पत्र के लिए उससे 200-500 रूपये मांगे जाते हैं, उसकी व्यथा एक बार महसूस कर के देखें, यदि आप सचमुच भारत के एक नागरिक हैं तो आपको अपने मतदान का गंभीरता से सदुपयोग करना होगा।
देश के युवाओं को बखूबी पता है की सरकारी नौकरी के लिए कुछ पदों पर लाखों अभ्यर्थी परीक्षा में शामिल होते हैं सरकारी तंत्र द्वारा 12वीं उत्तीर्ण अभ्यर्थियों की आवश्यकता होती है परंतु बड़ी संख्या में स्नातकोत्तर तक के अभ्यार्थी उस परीक्षा में शामिल होते हैं परंतु विडंबना यह है की लाखों अभ्यार्थी जो परीक्षा में उत्तिर्ण नहीं होते वह कहां जाते हैं और क्या करते हैं। हमारे देश में औद्योगिक विकास का क्या स्तर है यह भी शिक्षित युवाओं से अच्छा कोई नहीं जानता। यह समय है भारत की प्रत्येक नागरिक को बताने का की प्रतिस्पर्धा सिर्फ सरकारी नौकरी पाने के लिए नहीं, व्यापार में नहीं बल्कि राजनीतिक के प्रत्येक छोटे से ऊंचे तबके के नेताओं का विकास के लिए होनी चाहिए और यह लोकतंत्र अर्थात जनता के लिए मुझे नहीं लगता कि जरा सी भी कठिन काम है।
भारत में मुफ्तखोरी की राजनीति को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। 26 अगस्त 2022 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव से पहले राजनीतिक दलों द्वारा वितरित मुफ्त उपहारों (Freebies) पर प्रतिबंध लगाने के लिए दायर याचिकाओं को तीन सदस्यीय पीठ के पास भेजा था। यह पीठ, किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले इस तरह की प्रथा के निहितार्थों पर विचार करेगी।
हाल ही के दिनों में मुफ्तखोरी भारत की राजनीतिक में विवाद का विषय बन गया है। चुनाव के दौरान राजनीतिक दल, मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए मुफ्त बिजली/पानी, बेरोजगारी भत्ता, महिलाओं और श्रमिकों को भत्ता, मुफ्त लैपटॉप, स्मार्टफोन, साड़ी-कपड़ा आदि मुफ्त देने का वादा कर एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में हैं।
मुफ्तखोरी की राजनीति का नैतिक पहलू यह है कि जब राजनीतिक दलों को चुनने की बात आती है, तो यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि किसी पार्टी ने मुफ्त उपहारों के रूप में कितना प्रोत्साहन दिया है, दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि राजनीतिक दल लोगों को अपने पक्ष में मतदान करने के लिए एक प्रकार से रिश्वत दे रहे हैं।
इसका आर्थिक पहलू यह है कि राजनीकि दल, सरकार के खर्चे पर मतदाताओं को मुफ्त उपहार दे रहे, लेकिन क्या यह उस राज्य की आर्थिक स्थिति के लिहाज से उचित है? हाल ही में श्रीलंका में घटी घटना इसका उदाहरण है। जानकारों का मानना है कि श्रीलंका के आर्थिक पतन का कारण वहां के राजनीतिक दलो द्वारा दिए गए मुफ्त उपहार रहे हैं।
व्यापक आर्थिक अस्थिरता का खतरा: मैक्रोइकॉनॉमिक्स का मूल ढांचा स्थिरता है और मुफ्त उपहार से अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। मुफ्त की योजनाओं से राज्य का आर्थिक ढांचा कमजोर हो सकता है क्योंकि दी जाने वाली सब्सिडी का राज्य की वित्तीय स्थिति पर प्रभाव पड़ेगा। इसका कारण यह है कि मुफ्त की सुविधाएं देने वाले अधिकांश राज्यों के पास इसके विए मजबूत वित्तीय ढांचा नहीं है।
इसके संबंध में यह तर्क –
- अगर कोई सत्ताधारी दल, राजनीतिक लाभ के सरकारी पैसे को मुफ्तखोरी पर खर्च करते हैं, तो इससे राज्या का वित्तिय ढांचा विगड़ सकता है।
- हालांकि राज्यों को यह तय करने की स्वतंत्रता है कि वे अपना पैसा कैसे खर्च कर सकते हैं, वे असाधारण परिस्थितियों में ऐसा कर सकते हैं।
- वे परिस्थितियां तब लागू होती हैं जब कोई राज्य राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) नियमों के अनुसार अपनी सीमा से अधिक उधार लेता है।
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए खतरा : राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव के दौरान सार्वजनिक धन से मुफ्तखोरी और तर्कहीन वादे करना करना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। मुफ्तखोरी की घोषणाएं स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की धारणा के खिलाफ है क्योंकि जाहिर तौर पर हर राजनीतिक दल की सार्वजनिक धन तक पहुंच नहीं होगी।
मतदाताओं को रिश्वत : मुफ्त के वादे को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी सवाल है कि यह प्रथा कितनी नैतिक है क्योंकि यह मतदाताओं को लुभाने के लिए एक तरह से रिश्वत देने के समान है।
अनियोजित वादे : आजकल चुनाव के दौरान अनियोजित तरीके से जनता के लिए मुफ्त सुविधाओं की घोषणा करने में हर राजनीतिक दल एक-दूसरे से आगे निकलना चाहता है, लेकिन इस प्रकार की अनियोजित मुफ्त सुविधाओं को राज्य के बजट प्रस्ताव में शामिल नहीं किया जाता है।
राज्यों पर आर्थिक बोझ बढेगा : भारत के अधिकांश राज्यों की वित्तीय स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। वहीं, राज्यों के पास राजस्व के लिए भी बहुत सीमित संसाधन हैं। इसलिए चुनावी फायदे के लिए लोगों को दी जाने वाली मुफ्त सुविधाओं से राज्य के सरकारी खजाने पर असर पड़ता है।
अनावश्यक व्यय बढेगा : नेताओं द्वारा जल्दबाजी में मुफ्त सुविधाओं की घोषणा करने से राज्य के खजाने पर अनावश्यक व्यय को बढ़ा जाता है। हालांकि गरीबों की मदद के लिए पानी और बिजली जैसी आधारभूत जरुरतों और कुछ कल्याणकारी योजनाओं को के लिए धन के व्यय को जायज ठहराया जा सकता है।
विनिर्माण उद्योग पर नकारात्मक प्रभाव : मुफ्त उपहारों से विनिर्माण क्षेत्र की गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो जाती है। क्योंकि मुफ्त सेवाओं की घोषमा कुशल और प्रतिस्पर्धी बुनियादी ढांचे को कमजोर करती है, जो विनिर्माण क्षेत्र में उच्च-कारक क्षमता को सक्षम बनाता है।
दीर्घकालिक वित्तीय घाटा : सत्ताधारी दलों द्वारा एक बार मुफ्त उपहारों की पेशकश करने के बाद वो अगले चुनाव तक अपने वादो के चक्रव्यूह में फंसे रहेंगे और उन्हें पूरा करने के लिए मजबूर हो जाएंगे। इससे राज्य के सरकारी संसाधनों पर वित्तीय दबाव बढ़ेगा।
एक उपाय-एक मौका 5 वर्ष में सिर्फ एक बार :
मतदाताओं के मध्य जागरूकता सर्वप्रथम- चुनाव के दौरान लोकलुभवन वादों पर वोट देने से पहले लोगों को यह समझना चाहिए कि वे अपने वोट मुफ्त में बेचकर क्या गलती करते हैं।
मुफ्तखोरी के चक्कर में लोग अच्छे नेताओं की अपेक्षा कर देतें हैं जिसका खामियाजा बाद में भुगतना पड़ सकता है।
मुफ्त की योजनाओं के बजाए रोजगार पैदा करना- सत्ताधारी पार्टियों मुफ्त की योजनाओं पर धन खर्च करने के बजाए रोजगार पैदा करने में धन खर्च करना चाहिए।
सरकारी धन का उपयोग देश के बुनियादी ढांचे को विकसित करने और कृषि को बढावा देने में खर्च करना चाहिए, जिससे रोजगार के अवसर पैदा होंगे और मुफ्त सुविधाएं देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इससे देश की प्रगति और सामाजिक उत्थान होगा।
जनता चुनाव के समय सही फैसला लेकर राजनीतिक दलों के इस तरह के मुफ्तखोरी प्रयासो को प्रभावी ढंग से खत्म कर सकती है।













